क्या ऐसी ही है हर कुदरत?
या बस इंसा की ये फितरत?
जिधर देखा, जहां, जो भी
उसी दम उसकी चाहत की

ज़र्रों को, ज़मीनों को
मोटर और मशीनों को
मिटटी के खिलौनों की
रेशमी, नर्म बिछौनों की

ख़ुदा से नेमतें चाहीं
वफ़ा की कीमतें चाहीं
चाहा है दुनियां भी घूमना
और माँ का माथा चूमना

महफ़िल में खनकते जामों को
ख़ामोश, अकेली शामों को
चाह जीने में जुनूं भी हो
हर शब नींदों में सुकूं भी हो

दौलत में हमेशा बरकत हो
यारों में हमारी शौहरत हो
रब की हरेक रज़ा भी हो
और कुफ़्र का मज़ा भी हो

चाहा की हो जन्नत यहीं
चाहा तो बस मय्यत नहीं
चाहा किये हैं राहत को
और चाहा भी है चाहत को

इन हसरतों से है क्या मिला?
हो ख़तम ना चाहतों का सिलसिला
सब हासिल पर बेचैन हैं
नई चाहतों में डूबे नैन हैं

पा ली जो हर हसरत, चाहत
मिल पाई क्या फिर भी राहत?
मिल जाए एक उसकी रहमत
वही चाहत, वहीं राहत