पास, फिर भी दूर इतने
छू न सकूं शब्दों से, नैनों से
न बाँध पाऊं स्नेहमयी आलिंगन में
सुन पाऊं न तुम्हारी धड़कन भी

दूर, फिर भी पास इतने
कि बसे हो मानस के कण कण में
एक एहसास, सदैव साथ यूं
कि हो हर सांस की आहट में

याद तुम्हारी तो आई नहीं कभी
पर देखा जब भी – रुक कर, चलते
हर मोड़, हर लम्हा पाया तुमको
बातो-यादों में, करवट हर सलवट में

सोचती भी हूँ कभी ये
कि चल रही हूँ अकेली ही
तो पाती हूँ तुम में ही हौसला
तुमसे ही मेरे क़दमों की हिम्मत भी