चैन से तुमको बैठे तो देखा नहीं
हर समय कुछ न कुछ करती जाती थी तू
कभी बर्फी, या लड्डू, तो गुजिया कभी
अपने हाथों से हमको खिलाती थी तू
तेरे हाथों का हलवा अब मिलता नहीं
वो निवाले बहुत याद आते हैं माँ

तूने हमको सुनाई कहानी जो थीं
उनमे परिया न थीं, ना ही राजा कोई
वो थी गाथाएं मामूली इंसानों की
उनकी मेहनत की, हिम्मत की, बलिदानो की
वो कहानी जो तब इतनी रोचक न थी
वो कहानी बहुत याद आती है माँ

कहने को तो भरी अपनी अलमारी है
पर वो जैकेट तो सारे ही बाज़ारी हैं
यूँ तो उनको पहन ठण्ड कट जाती है
पर वो गर्माहट उनसे माँ आती नहीं
आसमां से ले रंग था जो तूने बुना
वो ही स्वेटर बहुत याद आता है माँ

आज दुनिया में हैं कितने करतब नए
मन को बहलाने की कितनी तरकीबें हैं
उनके पीछे हमेशा ही भागा किये
अनगिनत हम खिलौनों से खेल किये
अपने हाथों बनाई थी तूने जो एक
वो ही गुड़िया बहुत याद आती है माँ

तेरी गोदी की नींद कितनी रहत की थी
कितनी ठंडी थी तेरी वो आँचल की छावं
स्नेह से जब सराबोर मुस्काती तुम
झिड़कियों भी तेरी कितनी मीठी लगे
तेरी यादें बहुत अब सताती हैं माँ
तू तो पूरी बहुत याद आती है माँ