बहुत दूर आ गयी हूँ मैं
घास के गलीचे पे
बिछी सींक की चटाई से
इन बहुमंजिली इमारतों सफ़र में
कुछ छूट सा गया है
खट्टे मीठे अनुभवों के बीच

पीछे रह गयी वो रज़ाई
जिसमे घुस जाया करती थीं हम बहने
और गुज़र जाती थी रात
बस बातों की गर्माहट में
आवाज़ अब भी आती है
दोस्तों के कह्कशों की
गुलज़ार था जिससे मेरा घर

सरसों के तेल में डूबे
मिटटी के दिए भी
धूल में सने बैठे हैं कहीं
और मिट सी गयी है रंगोली भी
मालपुए और पुलाव से भी
वो खुशबू नहीं आती
वो ज़ायका तो
सबके साथ बैठने में था
यूँ अकेले खाने में कहाँ

ऐसा नहीं है
की खुश नहीं हूँ मैं
खुल के हसती हूँ अकसर
और जलसे भी हैं बेशुमार
पर दिल के एक कोने  में
आस है कहीं
की घास का वही गलीचा होगा
और सुकून से लेटी हुई मैं