बहुत कुछ है मेरे इस घर में
एक आँगन –
धूप खिलती है जहाँ दोपहर में।
कुछ लाल, बड़े गमले
कोपलें फूट रही हैं जिनसे –
कोमल, हरी, पारदर्शी सी।
कुछ झूले और फिसलपट्टी।
एक नलके से लगी
पानी की होज़पाइप,
वो भी हरी है – कथ्थइ नहीं
जैसी मेरे पापा की थी।
आँगन में भी
बस गीले कपड़े ही हैं,
तार पे लटके, हवा में उड़ते।
न मेरी माँ की तुलसी है,
न शिवलिंग को जड़ों में समेटे
लाल धागों से बंधा
केले का पेड़।
दृश्य कुछ वही है
फिर भी वैसा नहीं
न छोटी सी मैं हूँ,
न मेरी बहने।
पर छोटी सी मेरी बेटी है
और हैं माँ-पापा उसके – हम।
नटखट किलकारियों से
बदल सा गया मेरा आँगन।
कुछ अधूरा तो है
पर है बहुत कुछ पूरा भी।
जिस सुकून को मुद्दत से
ढूंढ रही थी मैं,
आज पाया उसको
यूँ ही खेलते हुए –
मदमस्त, बेपरवाह
मेरे आँगन में।