सपने में आये थे
कल रात पापा
बैठे कुछ देर,
चंद बातें की,
और फिर चले गए
मेरी नींद खुलने से पहले।
जानते जो हैं
बहुत मसरूफ़ है उनकी बेटी,
दफ्तर और घर की
जद्दोज़हद में।
सो ऐसे आये
कि ख़लल भी न हुई,
न ज़ाया हुआ मेरा कीमती वक़्त।
ऐसे ही होते हैं
सारे पापा, डैडी, बाबा,
मेहनत के ख़ारे पानी में
गला कर जवानी
चला करते हैं भर कर
आँखों में सपने।
उन्हीं सपनों पर देखती हूँ –
आज मोटे चश्में।
अक्षर दर अक्षर
सिखाया जिन उँगलियों ने
सपनों को बुनना,
हारते देखती हूँ उनको
कीबोर्ड के आगे –
कुछ निराश और भारी सी।
लड़खड़ा सी गई हैं वो साँसें
उड़ा करती थीं जो
सपनो की डोर पर।
उनके तो थे
फिर भी उनके नहीं थे।
वो सपने हमारे थे –
आसमान मिला जिन्हें
उनके ही हौंसले से।
उन सपनों की कच्ची ज़मीन को
बना कर पायदान,
चढ़ गए हम
जाने कौन से आसमान पर
कि उनके सपनों को
अपना लिया हमने
और सपना बन गए पापा।