मसरूफ़ी हो या ख़ालीपन
मेरे हर पल में बस जाते हो
मैं घर में हूँ या दफ्तर में
तुम बिखर हवा में जाते हो

क्यूँ सपनों में हो आते तुम
जब पास ही गुमसुम बैठे हो?
और दूर चले जाते हो जब
तब लाखों बातें करते हो!

क्यों प्रश्न हैं सारे मेरे ही?
उत्तर भी तुम न देते हो
क्या हैं कुछ प्रश्न तुम्हारे भी
जो खुद से पूछा करते हो?

क्यूँ जागी जागी रातों में
मैं तुमसे बातें करती हूँ?
क्या अलसाई सी सुबहों में
तुम भी मुझसे कुछ कहते हो?

क्या दीवानापन बस मेरा ही
या तुम भी कुछ दीवाने हो?
मसरूफ़ी हो या ख़ालीपन
मेरे हर पल में बस जाते हो.