कुछ तो मतलब है लोग मिलते हैं
कुछ तो मतलब भी है बिछड़ने में
यूँ ही मिलकर के फ़िर बिछड़ जाना
कुछ तो मतलब है ऐसा होता है

जिनके होने का ना था अंदाजा
फ़िर क्यूँ वो हैं अज़ीज़ हो जाते
जिनसे रौशन हमारी दुनिया थी
अजनबी वो कभी यूँ हो जाते

यूँ कभी तो गुज़रते पन्नों में
है कोहिनूर कोई मिल जाता
और कभी टूट जाती है माला
सच्चे मोती भी बिखर जाते हैं

मैंने देखा है ऐसा ही अक्सर
वो ही मिलते हैं जो ज़रूरी हैं
इत्तेफ़ाकन कभी नहीं मिलता
फ़लसफ़ा होता है हर मिलने में

जो सबक़ सीख लेते हैं हम तो
वो किताबें नज़र नहीं आती
जिनसे बाक़ी कुछ कहना-सुनना है
मोड़ दर मोड़ वो ही मिलते हैं

यूँ ही इंसान सोचा करता है
ये मुलाक़ातें हैं उनके मतलब से
क़ाश वो ये कभी समझ पाते
ये तो मिलते हैं मर्ज़ी से रब के