न जाने क्यूँ
अपना सा लगता था
उसका घर

न जाने क्यूँ
एक सुकून सा था
उसके होने में

उसकी रसोई में था
माँ का स्वाद
घर की बातें

देखा था मैंने
बचपन को खिलखिलाते
उसकी चादर पर

वादियों के बीच काटे थे
इंतज़ार के पल
स्कूल की बेंचों पर

आज
कुछ पल तो मेरे
सूने हैं

और
वो घर भी अब
पराया है