जब नई किताबें आती थी,
तुम उन पर ज़िल्द लगाती थी.
और फिर बड़े क़रीने से
लेबल उन पर चिपकाती थी.
सुबह सवेरे भर बस्ता
जब हम स्कूल को जाते थे,
पीछे से टाटा करती तुम
बोलो क्या सोचा करती थी?

हम स्कूल से वापस आते थे,
फिर किस्से सारे सुनाते थे.
घंटों हम बोलते जाते थे,
तुम बेथक सुनती जाती थी.
शाम को बैट या रैकेट ले
हम खेलने बाहर जाते थे,
तब बालकनी में बैठी तुम
कैसे मन को बहलाती थी?

कुछ शामों को पार्टी होती,
हम सज धज उनमे जाते थे.
और होते थे कुछ ऐसे दिन
जब दोस्त हमारे आते थे.
तुम शामिल तो कम ही होती,
चुप चुप बस देखा करती थी.
मैं सोचती हूँ क्या तुम भी तब
एक दोस्त हो, चाहा करती थी?

आया वो दिन, कुछ हासिल हो –
निश्चय कर घर से निकल पड़े.
न हम तुमको चिट्ठी लिखते,
न फ़ोन पे ज्यादा तुम आती.
होती छुट्टी तब घर आकर
दिल्ली की बातें करते थे;
तब देर रात, अंधेरों में
क्या जागती सपने बुनती थी?

ज्यादा अब भी न कहती हो –
बस आँखें बोला करती हैं.
मिल कर हमसे हर्षाती हैं,
हों दूर तो बरसा करती हैं.
हम पर तुम करती हो गौरव,
हम पर तुम स्नेह लुटाती हो.
माँ तो ना हो,फिर भी माँ सा
ये प्यार कहाँ से लाती हो?