द्रौपदी
मेरा नाम।
तुम्हारे लिए, अपशब्द।
मेरी व्यथा – तुम्हारा हास्य।
बीत गए युग;
कुरुओं की राज्यसभा से
आज तुम्हारी बैठक तक,
सब कुछ तो बदल गया।
नहीं बदली किन्तु वो दृष्टि,
न बदला है दृष्टिकोण।

पांचाली
पांचों पांडवों की पत्नी मैं,
किन्तु है कोई क्या मेरा भी?
माता के वचन की मर्यादा मैं;
इंद्रप्रस्थ की महारानी,
कुरुवंश की पुत्रवधु।
हस्तिनापुर का नहीं
किन्तु मैं मान।
द्यूत की हारी हुई एक चाल –
बस इतना ही मेरा अस्तित्व।

यज्ञसेनी
यज्ञ की पावन वेदी से उत्तरित
मैं अयोनिजा।
पतितों की सभा में मेरा अपमान ही
कौरवों के घाव पर ज्यूँ चन्दन।
क्षत्रियों के शौर्य का निर्णय
बस चौपड़ की बिसात पर;
न बल, न शस्त्र, न युद्ध-कौशल।
ये मेरी देह ही
भरत-पुत्रों की रणभूमि।

कृष्णा
सखी धर्माध्यक्ष की,
पर धर्मराज के लिए
अंतिम एक दांव बस।
रक्त, श्वाश, भाव समाहित
मेरे हृदय का कोई न मोल।
पांडवो ने बाँट ली द्रौपदी और
सैरंध्री के हाथ में धर दिया
दासता की कालिमा…
अंधकार का अज्ञात प्रतिशोध।

महाभारती
मूल मैं उस युद्ध का।
सरल है, यह भार भी नारी का हो;
पुरुष तो हर दोष से है परे।
देखती हूँ आज तक दृष्टि वही –
आदरणीय पांडव, भीष्म, द्रोण हैं
और द्रौपदी- परिहास का पात्र।
कुरु सभा में मेरे सखा थे आ गए,
पर अब सनातन स्वयं भी आते नहीं;
इस काल कैसे हो सुरक्षित द्रौपदी?