इश्क़ यूँ बैठा परे है
हाथ में लेकर क़लम
पन्ना-पन्ना, हर्फ़-हर्फ़
पढ़ रही है आशिकी

चंद बक्सों में समेटी
आज हमने ज़िन्दगी
अधखुली कुछ बोतलों से
है उमड़ती आशिकी

लड़खड़ाते पैरो का
देखो सहारा कौन अब
बर्फ़ की आहों पे ठंडी
सिंक रही है आशिकी

शेरो-शायर या फ़िज़ा का
इश्क़ कब मोहताज़ है
दो धड़कते दिल हों संग
बस है मुकम्मल आशिकी