मेरे गले का हार ही
पावों की बेड़ी बन गया
कितनी ही खोली खिड़कियां
सबसे अँधेरा छन गया

ऊँची, वसी दीवारों से
एहसास क्यूँकर पार हों
चौखट पर उखड़ी सांस हैं
पर्दा कफ़न सा बन गया

दबीज़ इन कालीनों ने
सोखी हैं कितनी सिसकियाँ
है दर्द यूँ परवान पर
आँसू भी हंसकर थम गया

बेज़ार हैं अब लफ्ज़ भी
आग़ाज़ ना अंजाम कुछ
आवाज़ हमने की बहुत
सन्नाटा सब में सन गया

मेरे गले का हार ही
पावों की बेड़ी बन गया
कितनी ही खोली खिड़कियां
सबसे अँधेरा छन गया