तुम भरते हो दम
तुम्हारे दर्शन
तुम्हारे शास्त्र
तुम्हारे संस्कारों का
तुम्हारी सभ्यता सुन नहीं पाती
एक विपरीत दृष्टिकोण
सुन पाओ कभी तो सुनना
स्वयं का तुम स्वर
क्यूंकि रिसता है
तुम्हारे शब्दों से
तुम्हारी फफूंद लगी मानसिकता
का मवाद
दिखता है
तुम्हारे प्रश्नों में
तुम्हारी अज्ञानता का अंधकार
व्याप्त है
तुम्हारे जीवन में
कथनी और करनी का दोगलापन
करते हो तुम
शास्त्र की बातें
तो आओ
शास्त्रार्थ करो
मत करो व्यर्थ ही
अपमानजनक विशेषणों की वर्षा
तर्क करो
निजी टिप्पणियां कर
न करो व्यक्त अपना खोखलापन
विवाद करो
करो तुम ज्ञान और विज्ञान की बातें
गर्व करो
पर समझो दंभ से अंतर भी
कहो तुम
कि है तुम्हारी सभ्यता
प्राचीन, अद्भुत, श्रेष्ठ
हम सुनेंगे
क्यूंकि हमारे संस्कार
शिष्टाचार और समानता हैं
क्यूंकि हमारी संस्कृति
हमारे शास्त्र
मानवता को मानते हैं
´वसुधैव कुटुम्बकम´ को जानते हैं