बहुत बोलती हूँ मैं।
निरंतर भन्नाते रहते हैं शब्द
मेरे दिमाग के कनस्तर में –
परस्पर टकराते, बुदबुदाते, बदहवास।
कभी उत्सुक, कभी उदास।
कभी बातूनी अंदाज़ में, चहक कर,
बुनते हैं कहानियां नई पुरानी;
फिर बैठ जाते हैं
सुबह के शांत समुंदर से।
आहत, कभी अनाहत भी।
स्वाहा, और समाहित भी।
बहते चले जाते हैं
मेरे भावों के प्रवाह में –
सदैव अवाक्।
किञ्चित ही पाते हैं स्वर
और फूट पड़ते हैं नीरव को चीर;
सोंच कर, समझ कर, संभल कर।
और तब… तब सुनती हूँ मैं –
´बहुत बोलती हो तुम´।