जब बातें तुमसे करती हूँ
तुम भी मुझसे कुछ कहा करो,
जब चिठ्ठी लिखती हूँ तुमको
उत्तर तुम कुछ तो दिया करो।

अपने भावों को मन ही मन
तुम अक्सर पीते जाते हो,
भर कर भीतर फिर भंवर जाल
तुम बादल से घुमड़ाते हो।

आँखों में जो हो शब्द भरे
उनको तुम वाणी दिया करो,
भाषा का कुछ उपयोग करो
काग़ज़ कुछ काले किया करो।

तुम्हे देख ठिठक सब जाते हैं
तुम कदम कभी तो बढ़ाया करो,
जो मन में चुटकी लेते हो
कभी बाहर भी मुस्काया करो।

कभी तुमसे मैं कुछ पूछूँ तो
थोड़ा तो समय तुम दिया करो,
बस शिष्टाचार समझ कर ही
बातें तुम कुछ तो किया करो।