पद्मिनी, पद्मावती; मचा हुआ है हाहाकार;
नाक काट लो, ले लो प्राण – आहत जनता करे पुकार।
केसरिया साफ़ा पहने अब करनी सेना जागी है –
जौहर करने महिलाओं ने घर की चौखट लांघी है।

मूल्य इन्होंने आन-बान की इतनी ही बस आँकी है –
सिनेमा पर निकली तलवारें, रावण सारे बाकी हैं।
प्राण न्योछावर करने को बस यही इन्हे अभिप्राय मिला –
राजपूतानी मान को बस अब यही एक पर्याय मिला।

तथाकथित महारावल थे, किवदंती की एक रानी थी;
सदियां बीत गई अब तो – जयसी ने लिखी कहानी थी।
रूपवती हैं रानी, कह कर खिलजी को उकसाया था –
ब्राह्मण दरबारी खिलजी को राजपुताने लाया था।

विश्वास इतना वीरता पर अपने महारावल को था –
राज्य बचाने त्याग रण, तत्पर दर्पण का शरण लिया।
राजपूती रक्त में थी बस आँच इतनी रह गयी –
अरि समक्ष प्रस्तुत किया; दासी सही, वह स्त्री तो थी?

रानी को ले जाने खिलजी ने सेना को तैयार किया –
राजपूत पड़ोसी ने तब देख सुअवसर वार किया।
आपस में लड़ मरे थे राजा, खिलजी को बस राख मिली –
इसी कहानी से करनी सेना को अपनी साख मिली।

काल्पनिक महारानी का ये आज बचाने मान चले;
आगजनी, मनमानी कर; रौंद ये विधि-विधान चले।
राजपूतों की जयगाथा के सबसे स्वर्णिम ये पन्ने हैं;
शंखनाद सुन रणबांकुरों का बच्चे दहले-सहमे हैं।

रानी के जौहर को सबसे अग्रिम बलिदान ये कहते हैं।
शत्रु हाथ न लग पायीं – बस इस अभिमान में रहते हैं।
ढकी आँखों, दबी वाणी, कल्पित इतिहास के मध्य पला ;
जली हुई लाशों का क्रंदन कैसे वो सुन पाए भला ?

बने विवाहित फिर-फिर दूल्हा – संस्कृति के अनुकूल है –
पर खिलजी का स्वप्न दृश्य भी उर में इनके शूल है।
प्रत्यक्ष दिखाई पड़ते हैं इनके सब दोहरे मापदंड;
राजनीति के हथकंडे, कुंठित पुरुषार्थ के पाखंड।

नाबालिग कन्याओं को जो विवाह कुंड में झोंकते हैं,
नमक चटा नवजातों का जीवन असमय ही रोकते हैं;
जहाँ प्रतिष्ठा की वेदी पर लक्ष्मी-दुर्गा चढ़ें बलि –
पद्मावती की आन बचाने आज वहीं से भीड़ चली।

धर्म-जाति के हवन में भारत माता प्रतिदिन जलती हैं।
स्वार्थ निहित शक्तियां मूढ़ मन्दों को प्रतिपल छलती हैं।
यही हमारी नियति-निमित्त, यही वो उज्जवल भविष्य?
आस में जिसकी आज हम हैं गटक रहे दूषित हविष्य?