आज हाथ ख़ाली, भरा भरा सा मन है
आज आँखें भीगी और सूखा ये तन है
गुलाल की खुशबू न गुजिये की मिठास है
बीते पलों की मस्ती का बस एहसास है
रसोई से निकलते अनगिनत वो पकवान नहीं
दोस्तों के ठहाके गूंजते अब और कहीं
खो गयी मस्तियाँ जो होती थी त्यौहार पर
झूमते थे हम भी कभी मेघो-मल्हार पर
लकड़ियां बटोर करते होली तैयार थे
रंग और गुलाल से करते हम वार थे
भांग थोड़ी, थोड़ा नशा, ख़ूब ही ठिठोली थी
तुनक-झिझक-प्यार भरी अपनी वो होली थी
क्या हुआ जो आज नहीं बचपन की टोली है
रंग या गुलाल न हो, आज अपनी होली है
प्यारी सी मुस्कान संग गालों पे हल्दी है
थोड़ी चुहल हमने पिया जी पे मल दी है
टीस यूं ही हमने थोड़ी कम कर ली है
जीवन के रंगों से झोली यूं भर ली है
रंगों को ढूँढा देखा रंग ही हर ओर हैं
होली के रंग में हम आज सराबोर हैं