बहुत से ख़्वाब बुने थे इसमें
बड़े अरमानों से सजाया था
कुछ सितारे आसमां से मांग कर
इस घर का आसमां बनाया था

धड़कती थीं कई उम्मीदें यहाँ
इसमें भी इंतेज़ार रहता था
गुलज़ार बाग़ भी था बागबां भी
इस घर में भी क़रार रहता था

वो भी एक वक़्त देखा था इसने
नन्हे कदमों से आयी इक परी थी
उसके नाज़ों को उठाया था इसने
इस घर की ज़मीन तब हरी थी

दरों -दीवार अब वीरान हैं
और सितारे भी धुंधले हो गए
अरमानों को मोती सा पिरोने वाले
वो आँखें और वो दिल सो गए