बहुत ही सस्ता होता है
फुटपाथ का आदमी।
इधर उधर से मुफ्त बटोरी
फटी प्लास्टिक की चादरें,
सस्ते एल्युमीनियम के बर्तन,
मुनिसिपलिटी की टपकती टोटीं,
मांगे कपड़ों की पोटली,
दान में मिले कम्बल,
सड़क की सस्ती धूल।
बस इतनी ही सस्ती होती है
फुटपाथ की ज़िन्दगी।
पर उससे भी सस्ती है
फुटपाथ के आदमी की मौत –
रात की उखड़ती, भूखी नींद,
बिन चालक कोई गाड़ी;
कुछ मनमाने से पहिये बस!
और मुफ्त में काम तमाम।
हाँ, लिखे जाते हैं कई पन्ने…
सस्ती मौत का भी बाज़ार लगता है।
पर हाथ कुछ नहीं आता –
बस शून्य बटा सन्नाटा…
फुटपाथ पर ही दम तोड़ देता है
फुटपाथ का वो आदमी।
उसके सिक्कों की औक़ात कहाँ
कि ख़रीद सके एक दिन को भी
मज़बूत कोई कारागार।
और हँसता है मुख्य पृष्ठ पर.. .
महंगा, काला हिरन।