भूलती ही नहीं
वो बातें …
भूल जाना था जिन्हें
अरसा पहले।
धंस गयीं हो जैसे
अंतर्मन के अंतरतम में।
उफ़न पड़ती हैं फ़िर फ़िर
ज्वार की भांति;
पर लांघ नहीं पातीं
नयनों की मर्यादा को।
कंठ में अटक जाती हैं यूँ –
मैं नीलकंठ ज्यूँ।
बरसों पहले निगली बातें।
सर्द, खुरदरी, गीली बातें।
न जाने वो दर्द हैं ,
या दवा।
न मेरी, न मुझ से
फिर भी …
उन बातों से हूँ मैं।