कभी वो दिन हुआ करते थे,
जब छुट्टियों और त्योहारों में
माँ फ़ोन किया करती थी –
¨बेटा, घर आ जा,
तेरी पसंद के पकवान बनाउंगी।
साथ मिलकर खाएंगे।
साथ ही खुशियां मनाएंगे।¨

और अब
भाई फ़ोन करता है;
¨भैया, घर आ जाओ।
बाबा गोश्त लाये हैं –
मंदिर में बली चढ़ाएंगे।
पहले हम ही भोग लगाएंगे।
गोश्त नरम, ताज़ा है ;
आओ, हम सब मिलकर
उसे नोच-नोच खाएंगे।
आओ, कि हर वक़्त अपनी होली है –
मासूम के ख़ून से खेल कर दिखाएंगे।
आ जाओ – हाकिम चुप बैठा है;
हम अच्छे दिन का जश्न मनाएंगे।
धर्म निरपेक्षता की चिता जलाएंगे।
इस देश के नायक बन जायेंगे।

अब और कितने अच्छे दिन आएंगे ?
कब तक उस आस में हम ठूंठ बनते जायेंगे ?