साँसे भी चुप सी हो गयीं, पैग़ाम ऐसा पढ़ गए
उफ़ भी ना निकली वो क़त्लेआम ऐसे कर गए

यूँ तो महफ़िल में बहुत शम्मां थी रौशन रात भर
नूर ऐसा लाये वो, परवाना हमको कर गए

हमको पता भी ना चला आग़ाज़-ए-इश्क़ कब हुआ
बेपर्दा इस दिल का वो अंजाम ऐसा कर गए