आज फिर से वो बहुत याद आये –
उनकी वो प्यारी हँसी,
वो चाल मस्तानी,
और मुझे देखकर
उनकी आँखों का वो चमक जाना।

मुझे गोदी में बिठा कर सुनाया करते थे –
कबीर के दोहे,
बीरबल के किस्से,
और कविता झाँसी की रानी की।
मैं मंत्र-मुग्ध सुना करती थी।

फिर बहुत से सवाल करती थी –
पेड़ क्यों उगते हैं ?
क्यों बदलती हैं ऋतुएँ ?
ये कबूतर सुबह क्यों उठते हैं ?
मेरी बातों पर ठठा कर वो हँसा करते थे …

जाने क्यों उम्र यूँ दुश्वार हुआ करती है …
एक-एक पन्ना कर धीरे धीरे
सभी अध्याय फाड़ देती है।
मेरा बचपन उधड़ गया कितना …
न सिल पाऊँ क्यों ऐसे ये घाव देती है ?