आँखें ही सब कर दे बयाँ
लफ़्ज़ों का फिर है काम क्या
एहसासों से ही जब हो वफ़ा
बातों का फिर है काम क्या
उन्हें देख कर थम जाये जो
साँसों का ऐसी क्या करें
ना नींद ना हमें होश है
इस दौर का कहो नाम क्या