मुझसे ज़माने को शिकायत है बहुत;
ये चाहता है मैं बदल जाऊँ।
ख़ुश दिखना अब अच्छा नहीं माना जाता,
ज़रा ग़मग़ीन सा मैं बन जाऊँ।

थोड़ा सा कम मैं मुस्कराया करूँ,
ग़म-ए-ज़माने में बेसाख़्ता मैं ढल जाऊँ।
बहुत अदब से हर वक़्त न पेश आया करूँ,
कभी तो बेअदब भी बन जाऊँ।

हरेक हाँ में मेरी हाँ हो मुनासिब ये नहीं,
कभी गुरूर से ना की तरफ़ भी चल जाऊँ।
मुझसे कहते हैं, बचपन गुज़र गया मेरा;
कि संजीदा सी अब शख़्सियत मैं बन जाऊँ।

ग़म-ओ-ख़ुशी बहुत ज़माने से ना बाँटा करुँ,
अगर हो भीड़ तो चुपचाप मैं निकल जाऊँ।
थोड़ा ऊँचा मैं मकां और नज़रिया कर लूँ
ऊँचे लोगों में उठने के क़ाबिल बन जाऊँ।

क़शमक़श में हूँ ज़माने की सुनूँ या खुद की;
बनूँ पत्थर कि मैं मोम सा पिघल जाऊँ?
बड़ी उलझन है दोस्तों कोई सुलझा दो इसे;
कहो मैं मैं ही रहूँ या कुछ और हो जाऊँ?