सीली सीली
घटता – बढ़ता
सहन नहीं हो पाता है
कभी अचानक
तेज़ी से वो
घुस जाता है सीने में
और गिरता है
धीरे धीरे
बूँद बूँद कर आँखों से
बिन आहट फिर
हौले से
यूँ साँसों में घुल जाता है
चुभता है फिर
नश्तर नश्तर
भीतर भीतर तन-मन में
न जाने क्यों
जाता नहीं है
अपना सा ये दर्द कभी