बहुत अनजाना सा लग रहा है
आज ये शहर।
गयी थी मैं आज फ़िर
उन्ही सड़कों और बाज़ारों में,
जाती रहती हूँ जहाँ मैं अक्सर;
न जाने क्यों फिर भी आज
कुछ बेगाना सा लगा ये शहर।
ऐसे तो नहीं चमका था कभी
सूरज इन पहाड़ों पर –
ये तो वो धूप है जिसमें
भरी दुपहरी, बस्ता टाँगे
स्कूल से घर आती थीं
हम तीन बहनें।
मसालों में सनी कैरी की खुशबू है
आज इस शहर में।
माँ हो जहाँ ये वो शहर तो न था…
तो क्यों आज
माँ के यहीं होने का
एहसास दिला रहा है ये शहर?
कोई बहुत पुराना सा अफ़साना
लग रहा है ये शहर।
न जाने क्यों आज
बहुत अनजाना सा लग रहा है
ये शहर।