गहरा नीला यूँ आसमान हो,
हों घने काले बादल।
क्षितिज पर पहरा पहाड़ों का;
हो बूँदों का सरगम…
और तुम।

शीशे के इस पार सही,
पर संग भीगें हम
एहसासों की बारिश में…
और लिपट जाएँ फिर
गरम यादों की रज़ाई में।

पकौड़ों संग छने बातों के लच्छे –
कुछ नमक हम डालें,
तुम डालो कुछ मसाला।
कुछ सुन लें तुम्हारी;
कुछ अपनी कहें हम।

चाय की चुस्कियों में
पी लें सब बीता गुज़रा –
नई मंज़िलें फिर प्यालियों से उमड़ें…
ठिठक जाएँ हम तुम
इसी एक पल में ।

गाढ़ा नीला आज आसमान है,
और हैं काले बादल।
पहाड़ खड़े हैं इंतज़ार में;
है बूँदों का सरगम भी।
पर तुम नहीं हो…