कहते हैं,
शस्त्रों से भी धारदार
और तीक्ष्ण –
शब्द होते हैं।
पर कभी कभी,
शब्दों से भी ज्यादा
सन्नाटे चुभते हैं।
ये हृदय विदीर्ण करते हैं,
छाल-मांस को चीर
आत्मा भंजन करते हैं।
विनीत प्रतीत होते हैं ;
ये शांत-सौम्य सन्नाटे
स्निग्ध बन के छलते हैं।
निर्मोही ये सन्नाटे –
अंगारों से जलते हैं।
चट्टानों से दुष्कर
और हिमनद से बर्फीले
इन सन्नाटों के घाव
बहुत गहरे होते हैं।
कभी कभी…
शब्दों से भी ज्यादा
सन्नाटे चुभते हैं।