छोटी ही थी,
जब निकलना पड़ा था
शिक्षा की तलाश में बाहर।
फ़िर हर छुट्टी में
तीर्थयात्रा को निकले झुण्ड की तरह
वापस आती थी घर।
तब से अब तक
कई घर बसाये मैंने –
अकेले का मकान,
पति के साथ घर ;
मेरी बेटी का घर…
पर अपने जी में
चैन और घर वहीं रह गए –
माँ के घर।
बहुत असाधारण नहीं है
वो घर।
पक्षियों का कलरव है…
परिजनों का सान्निध्य…
और है मेरा बचपन।
थकान में, तनाव में,
या बस सुकून की तलाश में;
आज भी मन
बरबस उसी घर को ढूंढता है।
इसलिए, कभी-कभी
दफ़्तर के दोस्तों को
यूँ ही चाय पर बुलाती हूँ।
अपने देश की श्यामा न सही,
पर अपनी बालकनी में
पौधों संग तुलसी लगाती हूँ।
स्टील की थालियों में
धुली हुई धनिया सुखाती हूँ।
तेज़ धूप निकले तो
नीम्बू – मिर्च का अचार लगाती हूँ।
कभी-कभी मैं
इस अपार्टमेंट को
अपना घर बनाती हूँ।