दो भागों में बंटी हूँ मैं

एक भाग मैं सबकी –
दुनियादारियों की… ज़िम्मेदारियों की…
रिश्तेदारियों की।
सबसे कहती, सबकी सुनती,
थोड़ी खुशियाँ बीनती,
कुछ दर्द चुनती मैं।
कभी ठहरती, कभी भागती
सोते-सोते भी जागती मैं।
कर्म कमाती, क़र्ज़ चुकाती मैं।

एक भाग मैं अपनी –
न मालिक, न मुलाज़िम।
हर रिश्ते से आज़ाद मैं।
अपनी सोच, अपने सपनों की।
अपनी हसीं , अपने ज़ख़्मो की।
ख़ुद से कहती, ख़ुद की सुनती,
ख़ुद को बाँचती – बुनती मैं।
अपनी ही नादानियों से लड़ती..
अपनी राह बनाती चलती मैं।

दोनों ही भागों में
नहीं मैं अधूरी।
दोनों ही भागों में
हूँ मैं पूरी – पूरी।
फिर भी हूँ…
दो भागों में बंटी…
मैं।