बहुत नादान हूँ मैं –
चल रही हूँ अनवरत
और सोचती हूँ,
हूँ वहीं मैं –
चल पड़ी थी मैं जहाँ से
कई उम्र पहले।
हो किनारे पर खड़ी
ये सोचती हूँ –
सब कुछ वही है।
आती-जाती एक लहर ही कह जाती है –
जिस ज़मीं पर थी खड़ी
अब रेत भी तो वो नहीं है।
नई लहरों संग कुछ नया आता है।
और परत दर परत
पिछला छुप जाता है।
समय यूँ ही चाल हौली चल जाता है।
आज ही मैं जान पाई –
धुंध में चलती वो जो परछाइयाँ हैं –
वो तो मैं हूँ…
और हैं वो मेरे अपने।
वक़्त के कोहरे में ऐसी सन गई हैं
पहचान अब आती नहीं –
दूर इतनी हो गईं हैं
तन से वो होकर अलग अब खो गईं हैं।