सिमट जाती हूँ मैं
तुम्हारे आस पास।
समेट लेती हूँ
उलझे ख़यालों को।
बिखरती साँसों को चुन लेती हूँ –
क़रीने से सजा देती हूँ
तह कर, कहीं कोनों में।
चेहरे से पोंछ लेती हूँ
भावनाओं की उक्तियाँ।
आँखों पर खींच लेती हूँ
तटस्थ से परदे।
फ़िर पढ़ती हूँ तुम्हारी आँखों में
अक्षर-अक्षर वही बातें –
जिन शब्दों को बाँध रखा है
मैंने कई पहरों में…