बादलों से इस क़दर मोहब्बत न थी
जो तुम न थे मेरी ज़िन्दगी में।
तुम आये,
और संग ले आये बादल।
कभी गरजते, कभी झमाझम बरसते ,
और कभी
ख्वाबों की दुनियां में निगलते-लपेटते
ये बादल।
यूँ तो तुम नहीं आये मेरी ज़िन्दगी में –
मैं ही आकर बस गयी
तुम्हारे सीने में।
और मेरे सीने में बस गए तुम्हारे बादल।
वो भी वक़्त था
कि डरती थी मैं
हड्डियों तक सर्द कर देने वाले
तुम्हारे इन बादलों से।
और अब ये आलम है कि
इन के बिना बेचैन सी हो जाती हूँ।
कुछ मोहब्बत तो इनको भी है मुझसे
क्यूंकि आकर टंग जाते हैं ये
तुम्हारे स्लेटी आसमान में…
न बूंदों में बरसते हैं,
न बिजलियों संग कड़कते हैं।
जैसे की जानते हों
कि एक अजीब सी कशिश है
इनके यूँ आसमान में ठहर जाने में –
जब धीरे-धीरे, ख़ामोशी से,
अपने आग़ोश में भर लेते हैं…
तुम्हे भी… मुझे भी…
ये बादल।