यूँ तो तुम मेरे न थे
एक पल को भी हमदम
फ़िर भी क्यूँ लगता है
जैसे खो दिया तुमको

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इतनी उल्फ़त भी ना करो मुझसे
मेरे आँचल में न सिमट पाये
इस क़दर दिल मेरा भर आये के
इश्क़ आँखों से फ़िर छलक जाये

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इतने बेपरवाह तो न हो
जितने कि दिखते हो
बेपरवाह जो हो जाते
शिकवे थोड़े कम हो जाते

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किरदार हैं वहीं, एहसास भी वही हैं
एहसास-ए-बयां लेकिन हर वक़्त बदल जाते हैं
तुम मेरी वो ही अधूरी कहानी हो
कि जज़्बात उमड़ते हैं मग़र लफ़्ज़ ठहर जाते हैं

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तेरी तन्क़ीदों के बोझ तले
रूह भी दफ़्न हो गई है कहीं
कहाँ से लाऊँ वो शख़्सियत मैं अब
जिसे तुम आज याद करते हो

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दरो – दीवार मुझसे पूछते हैं
क्या सचमुच कभी ना आओगे
मेरा दिल ही नहीं समझा है अभी
किस तरह उनको फ़िर समझाऊँ मैं

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