यूँ तो तुम मेरे न थे
एक पल को भी हमदम
फ़िर भी क्यूँ लगता है
जैसे खो दिया तुमको

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इतनी उल्फ़त भी ना करो मुझसे
मेरे आँचल में न सिमट पाये
इस क़दर दिल मेरा भर आये के
इश्क़ आँखों से फ़िर छलक जाये

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इतने बेपरवाह तो न हो
जितने कि दिखते हो
बेपरवाह जो हो जाते तुम
शिकवे थोड़े कम हो जाते

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किरदार हैं वहीं, एहसास भी वही हैं
एहसास-ए-बयां लेकिन हर वक़्त बदल जाते हैं
तुम मेरी वो ही अधूरी कहानी हो
कि जज़्बात उमड़ते हैं मग़र लफ़्ज़ ठहर जाते हैं

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तेरी तन्क़ीदों के बोझ तले
रूह भी दफ़्न हो गई है कहीं
कहाँ से लाऊँ वो शख़्सियत मैं अब
जिसे तुम आज याद करते हो

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दरो – दीवार मुझसे पूछते हैं
क्या सचमुच कभी ना आओगे
मेरा दिल ही नहीं समझा है अभी
किस तरह उनको फ़िर समझाऊँ मैं

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यूँ ज़िन्दगी में तेरी कमी तो नहीं
घर का ख़ाली मग़र एक कोना है
यूँ तो आवाज़ अब भी गूँजती है
फ़िर भी कुछ तो है जो अब सूना है

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जिसको जाना न कभी लगता वो अपना क्यों है
उसको पाया न था फ़िर जाने का दर्द इतना क्यों है

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जो लफ़्ज़ों में बयां कर दूँ तो समझ पाओगे ?
जो बात साफ़ निगाहों में पढ़ न पाये तुम..

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नाक़ाम मोहब्बत ही जाँ नहीं लेती हरदम
मुक़्क़मल इश्क़ भी कभी बेजान कर देता है

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कभी जी चाहता है राख़ कर दें ख़त तेरे सारे
कभी हर हर्फ़ यूँ पढ़ते हैं जैसे साँसे उनसे ही

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