हम प्रवासी
तस्करी करते हैं
यादों की

भर भर लाते हैं
बक्सों में यादें
छूटे हुए वतन की

मोबाइलों में ढूंढते हैं
वही बीता वक़्त
वही छूटे दोस्त

क़ैद कर लें ज्यूँ
बढ़ते बच्चों की उम्र
झुर्रियों का फैलाव

छोड़ जाते हैं पीछे
थैलों में भरी यादें
झांकती-बिखरी यादें

ठहाके अब भी गूंजते हैं
यादों भरे उस घर से
जहाँ आना जाना था

यादों के मोल लेते हैं
इडली के साँचे
खुले-अधखुले मसाले

यादों के दम पर ही
हैं भीगी पलकें भी
मुस्कराहट के पल भी

सागर के इस पार भी
बादलों के उस पार भी
ख़रीदते हैं – बेचते हैं

तस्कर जो ठहरे
यादों के
हम बंजारे