ज़माना कहता है क्या उसकी तू परवाह न कर;
न मुड़ के देख, कि मंज़िल तेरी आगे है कहीं ।
बीती बातों पर अब तू कोई भी अफ़सोस न कर;
दौर मुश्किल था, मगर हार कर गुज़र ही गया ।

अंधेरों से होकर ये नूर पाया है,
उन अंधेरों को तू अपनी कमज़ोरी न समझ,
ये तो ख़ता है उन अक़्ल के ग़रीबों की
तेरे अंधेरों पर कालिख़ जो चढ़ाने आए।

अपने माज़ी को सीढ़ी बना उस ओर बढ़ तू
तेरे ख़्वाबों की ताबीर जहाँ मिलती हो;
इस सफ़र पर तू अकेली चली थी कभी
आज तू हिम्मत है सबकी, और ज़माना तेरा है।