अपने परों को
काटती रही हूँ
कुछ इस तरह;
कि भूल गई थी –
मैं पंछी हूँ,
उड़ सकती हूँ।
आज अचानक,
उग आये जो
फ़िर से पंख मेरे;
तो जाना मैंने –
भूल गई हूँ उड़ना भी।
लेकिन फ़िर भी
भर कर साँसें,
पंखों को फैलाया है।
एक ख़याल
ऊँची उड़ान का
फ़िर से मन में आया है।
क्या होगा
बद से भी बदतर?
गिर जाऊँगी?
टूट जाएँगे पर ये घायल,
मर जाउँगी?
मौत वो लेकिन प्यारी होगी।
मुक्त गगन में
अपनी अंतिम पारी होगी।
परकतरी बन कर
अब मैं ना रह पाउँगी।
कोशिश तो मैं कर जाउँगी।
पंछी हूँ मैं,
उड़ सकती हूँ –
एक बार फ़िर
ख़ुद को याद दिलाऊँगी।
मैं उड़ती थी,
और दोबारा उड़ पाऊँगी।