तुम पर अधिकार नहीं मेरा कोई।
मैं अन्य कोई हूँ, कहीं पृथक तुमसे ।
मैं नहीं योग्य कि सुनूँ तुम्हारे चिन्तन,
या मेरी मति की हो आवश्यकता भी।
अंग नहीं तुम्हारे निजी जीवन की,
आत्मीयों की गिनती में कभी ना आई।
किसी नाते से खड़ी प्रतीक्षा में ही रही हूँ,
प्रतिदान की ना अनुराग की मैं अधिकारी।
पर रहा समर्पित मेरा तन-मन-धन तुमको
मुझ पर …. सारे अधिकार तुम्हारे हैं।