वो खड़ा था,
सड़क के किनारे,
पुराने गत्ते के टुकड़े पर
बीती ज़िन्दगी का सार लिख कर लाया था।
फटे जूते –
जिन्होंने अच्छे दिन देखे थे कभी।
धूल में सने कपड़े,
आँखों में कुछ पुराने सपनों की लाश लिए।
कंधों पर
दुधमुँही बच्ची के संग
गए – आते जीवन का बोझ लिए।
उसकी पत्नी शायद
झेल नहीं पायी थी,
मीलों का वो अनजाना सफ़र…
अपनी बच्ची की भूख…
उसकी आशाओं ने उसके सपनों के साथ
रास्ते में ही कहीं दम तोड़ दिया…
साँसों का तो बस बहाना था।
भीख नहीं माँग रहा था वो –
काम चाहता था।
पढ़ा – लिखा था,
इज्ज़त की दो रोटी चाहता था।
मालूम होता था उसने देखी है
एक वो भी ज़िन्दगी;
जहाँ घर था, दफ़्तर था, परिवार था –
तमाम वो चीज़ें थीं
जिन्हें आमतौर पर आम माना जाता है ,
जो आज उसके लिए
कतई आम न था।
जाने क्या-क्या छोड़ कर आया था;
जाने क्या-क्या छूट गया था उससे …
जाने कितनी कहानियां थीं
उसके सपाट चेहरे के पीछे …
जाने क्या सोचता होगा
जब ठिठुरती ठंड में
अपनी बेटी को छाती से लगा
खुले आसमान तले सोता होगा।
वो नन्हीं सी बच्ची,
बेपरवाह जो दिन को सड़कों पर घूमती है,
रात को क्या माँ की गोद ढूँढती होगी ?
या ख़ुद को ही सुनाती होगी
राजा – रानी की कहानियाँ …
मीठी नींद की लोरियाँ …
या सूनेपन से ही बोझिल हो जाती होंगी
उसकी नन्हीं पलकें ?
शरणार्थी हैं वो …
पनाहगीर।
अकेले भी नहीं हैं –
हर रोज़ सड़कों के किनारे देखती हूँ –
किसी कॉलेज के पूर्व विद्यार्थी को,
कुछ बिखरे-अधमिले परिवारों को,
खुली-अधखुली … सार्वजनिक दिनचर्या को …
और बस आशा ही कर सकती हूँ।
शायद मिल जाये उन्हें
कुछ नया काम,
कोई छत नयी सी,
कुछ नयी आशाएं …
नयी कुछ हँसी –
जीने के नए बहाने कुछ।