क्यूँ ज़रूरी है
कि उल्लास के पलों को ही
संजोया जाये?
हम तो
उन पलों के आभारी हैं,
लड़खड़ाते हमारे कदमों ने
जिनमें चलना सीखा।
मुट्ठी में भींच कर रखते हैं
वो सादे-साधारण से पल –
जिंदगी के सच सुने-सीखे जिनमें।
कुछ सीधे-स्पष्ट से पल
स्वयं से स्वयं की ही परतें
खुलते देखी जिनमें।
इन्हीं क्षणों में जाना हमने
कौन अपना है क्या पराया है।
इन्हीं पलों में हमने
ख़ुद को फिर से पाया है।
मोद के पलों में क्या जाना किसने ?
साँच की पहचान तब ही होती है
आँच में जब तपते हैं नाते।
चाशनी से लबालब पलों का
कहें हमें भला है काम ही क्या ?
हमको वो रूखे पल ही प्यारे हैं –
सख़्त तो हैं मग़र वो सच्चे हैं।
वो जो अवसाद के
और अंधेरों के पल है –
उनको सीने से लगा रखेंगे सदा।
उन्हीं पलों में
पनप पाए हम;
वो पल तो हमारी ताक़त हैं।