मीठे थे वो पल ,
खिलखिला कर आपके संग
हँसे जिनमें।
मीठे थे
क्रोध के भी क्षण,
क्यूँकि अपनापन था उनमें भी।
लाड़ है आपका –
जो ऊँगली पकड़ कर
चलना सिखाया,
नए और अनजाने से
इस जटिल संसार में।
स्नेह ही है आपका
कि आज मैंने अपना यह
सारूप्य पाया।
पागलपन को मेरे
शह जो मिली आपकी,
फिर से सीखा खुल कर हँसना,
बेबाक़ जीना।
गुम हो गया था जो आत्मविश्वास –
आपके सान्निध्य में
फिर से पाया मैंने।
सीखा आपसे –
सपनों को अपने हवा देना;
पंखों को पूरी जगह देना।
जीत में या हार में –
समता सीखी आपसे।
नीति-लोक व्यवहार की
विषमता सीखी आपसे।
प्रतिष्ठा के चरम पर भी
विनम्रता – सीखी आपसे।
हरेक क्षण चैतन्य रहना,
साफ़ सब आलेख रखना,
सबका आदर, अपना मान;
सूक्ष्म चीज़ों का भी ध्यान ;
ऊँचा लक्ष्य, ऊँची उड़ान –
सीखा है सब आपसे।
पर व्यूह को खंडित करना
अभी सीखना बाकी है।
विद्यार्थी सदैव आपके ,
अभिमन्यु बन कर नहीं रहेंगे –
अर्जुन बनना बाकी है।