हाँ, तुम कह सकते हो
कि ख़ुदगर्ज़ हूँ मैं।
चुरा लेना चाहती हूँ,
तुम्हारे संग बिताये
हर लम्हे को।
समय की डाल से
उन लम्हों को तोड़,
छुपा लेना चाहती हूँ
कहीं …
तुम्हारी भी नज़रों के परे।
कभी अकेले में,
अँजुरी में भर,
उनकी ख़ुशबू लिया करती हूँ;
कभी पिरो कर माला एक,
गले में डाल लेती हूँ –
यूँ ही।
कभी उनके संग मुस्कुराती हूँ,
कभी कुछ गुनगुनाती हूँ।
बाँटना नहीं चाहती मैं –
मेरी लम्हों की अलमारी में
वहाँ रखती हूँ,
जहाँ अंदाज से टटोल कर ही
पहुँच पाती हूँ मैं भी।
क्योंकि तुम्हारे-मेरे बीच
ये लम्हे ही हैं
जो मेरे हैं।