सुनती हूँ,
पहले रामू लाया करता था –
बाज़ार से सौदा,
केमिस्ट से दादी की दवाई,
दर्ज़ी से छोटी की ड्रेस,
ट्यूशन से बच्चों को घर।
रामू बनाता था,
भैया के पसंद की सब्ज़ी
पापा की अदरक-इलायची की चाय।
अपने जादुई हाथों से ढूंढ़ निकालता था
मम्मी का गायब हुआ चश्मा।
कुछ तो कमाल था उसमें
कि घर हमेशा चकाचक,
घरवाले और मेहमान
बराबर ख़ुश रहा करते थे।

मैंने रामू को नहीं देखा।
बस कहानियाँ ही सुनती हूँ
रामू के अनंत चमत्कारों की।
मेरे आते ही
न जाने कहाँ विलीन हो गया !
मिलता कभी तो पूछती मैं ,
उससे उसकी शक्तियों का रहस्य।
मुझसे तो …
कहीं न कहीं हो ही जाती हैं गलतियाँ।
कभी भूल जाती हूँ,
पापा की चाय में अदरक कुटी हुई डलती है,
कटी हुई नहीं;
कभी छोटी की नेलपॉलिश का
रंग सही नहीं लाती,
कभी मम्मी जी की अंगूठी का
वज़न कम रह जाता है।
और मामाजी के सामने तो
जाने कैसे फ़िसल ही जाता है
मेरे सर से घूंघट;
और साथ ही डूब जाती है
ख़ानदान की इज्ज़त।

इन्होंने बिना किसी दहेज़ के
झट हाँ कर दी थी।
सोचा था,
मैनेजमेंट पढ़ी हूँ, कमाती हूँ –
घर-बाहर सब संभाल लूंगी,
बच्चों के ट्यूशन के पैसे भी निकाल लूँगी।
अच्छी सोसाइटी में बढ़िया घर बन जायेगा;
छोटी की शादी का खर्चा भी जम जायेगा।
पर कर न पायी मैं।
बी. ए. पास भाभी तक भी चढ़ न पायी मैं।
कोशिश तो बहुत करती हूँ –
घर में सबसे पहले उठ जाऊँ;
सबकी पसंद के पकवान बनाऊँ;
वीक डे में न सही,
वीकेंड में भाभी और मम्मीजी के संग
कपड़े धुलवाऊँ, अचार-पापड़ बनवाऊँ;
पूजा – पाठ में भी अव्वल आऊँ।
मेरे इष्ट परिवार की इच्छानुरूप,
कमाने वाला रामू बन पाऊँ !