घर
क्या होता है घर ?
चार दीवारें, दरवाज़े, छत,
कुछ बिस्तर, मेजें, कुर्सियाँ ?
साजो – सामान और भी कुछ डाल दो
फर्श और दीवारों पर,
बन जाता है उनसे घर ?
मेरे ख़याल में घर वो है –
आराम हो जहाँ, सुकून हो;
विचारों की, जज़्बात की आज़ादी हो;
आज़ाद हों जहाँ रिश्ते सभी;
आज़ाद हो जहाँ वज़ूद भी।
पूछती रहें न निगाहें इस क़दर
कि रूह भी घुट जाये साँसो के संग।
हो जगह इतनी
कि खुल कर खुल सकें
इन्द्रधनुषी, मकीं के पंख भी।
दरों – दीवारों में ढूंढा है मैंने –
ना मिला।
उम्दा हर सजावट कर के देखा –
ना मिला।
वो घर की एक खुशबू के लिए घूमी बहुत –
पर न मिला।
मेरा घर मिला मुझे
मन की तारें जब जुड़ी उन लोगों से,
हमसफ़र न थे मग़र जो साथ थे।
जीवन के हर एक मोड़ पर पाया जिन्हें
खुली बाँहों के संग स्वागत को खड़े।
न कोई प्रश्न, न आलोचना, न व्यंग ही –
सीमाओं में नहीं कभी बाँधा मुझे।
उनके संग मैं सदा आज़ाद थी,
बेफिक्र थी परवाह से।
मेरे दोस्तों ने मुझे नहीं तोला कभी
समाज के खोखले मयार से।
ख़ुद से भी कुछ परदे थे,
उनको खोल कर
जब खुल के जीना सीखा मैंने,
तब हुआ महसूस घर क्या होता है –
आराम और सुकून होता क्या भला।
अब धीरे-धीरे,
परत दर परत ख़ुद से ही खुल रही हूँ मैं।
सुकून की तलाश अब नहीं करती हूँ –
ख़ुद को ही ख़ुद का घर बना रही हूँ मैं।