देखा है तुमने कभी
अंधा कुआँ?
न जाने कितना कुछ
अपने भीतर भरे –
सूखी झाड़ियाँ,
घहन अंधेरा,
शायद कोई जादू….
जादू तो होगा ज़रूर
कि लोग खिंचे आते हैं।
कोई कहता है
भूत रहते हैं
उस अंधे कुएँ में।
आस-पास के जानकार
कुएँ के बाबत
कहानियाँ सुनाते हैं –
दिल दहलाने वाली,
दर्दनाक कहानियाँ।
प्रेत, किरात, टूटे सपने,
चकनाचूर प्रतिष्ठा,
घुटे अरमानों की कहानियाँ।
बावजूद इनके,
या शायद इनकी बदौलत ही,
दूर-दूर से आते हैं लोग
अंधे कुएँ के जादू से मोहित।
कोई सिक्के डालता है,
कोई सूखी-हरी टहनियाँ,
कंकड़, काग़ज़, काले गहरे राज़।
और वो कुआँ
लील जाता है सबकुछ,
बिना किसी हलचल के,
बेहिचक, अविचल, चुपचाप।
जैसे ज़मीन के अंदर
कोई ओर हो न छोर…
पता नहीं
उसमें गिरी चीजें
कहीं ठौर भी पाती हैं,
या गिरती ही जाती हैं
बेताल, अनन्त, अंधेरे,
अंधे कुएँ में…
सृष्टि के अंत तक
भटकने को मजबूर।
फ़िर भी आते हैं
कुएँ के वशीकरण के मारे।
कुछ ढूँढने आते हैं –
चैन, शांति, अंतरात्मा…
और उन्हीं की तलाश में
कूद जाते हैं अंधे कुएँ में।
क्या जाने क्या पाते हैं
ख़ुद को ही खोकर…
तुमसे मोहब्बत भी
उस अंधे कुएँ सी है।
मैं डालती जाती हूँ –
शब्द, एहसास, आँसू।
और वे सब
किसी अनन्त में
विलीन हो जाते हैं।
जाने तुम्हें छू कर निकलते हैं,
या कि इतने कमज़ोर हैं
कि तुम तक
पहुँच भी नहीं पाते।
तुम्हें तो सदा देखती हूँ
शान्त, अविचल, चुपचाप।
इच्छा बहुत होती है,
झोंक दूँ ख़ुद को भी।
पर ख़ुद को खोकर
तुमको पाऊँ
तो क्या पाऊँ।
शायद मोहब्बत का दस्तूर
नहीं सीखा मैंने।
पर अंधे कुएँ के
अनजान अंधेरों में
अनन्तर तक विचरण
मुझे मंज़ूर नहीं।
तुमको पाए बिना भी
तुमसे मोहब्बत मुकम्मल है मेरी।
ख़ुद से मोहब्बत के लिए
ये ज़रूरी है मगर
कि ख़ुद से ही
जुदा न हो जाऊँ।