चाँदनी रात का साथ नहीं चाहिए मुझे,
न चाहिए ठंडी हवाओं का सहलाना और गुज़र जाना।
मुझे मत देना रेशमी बातों, मधु रातों का वादा,
मख़मली घास की चादर न देना;
न देना गुलाब की पंखुड़ियों की ख़ुशबू न मदहोशी।

मुझे छोड़ देना अकेले –
रेत की खुरदरी गोद में सोने देना।
कि कुछ ही देर सही, रूह को आराम मिले।
छील कर तन को, रेत जब मन में उतर जाएगी,
किरकिरी सी चुभेगी, ज़रा सा दर्द भी होगा, मगर
उस दर्द के एहसास में एहसास तो होगा।
छोड़ देना मुझे, वहीं किनारे पर,
मेरे रिसते हुए एहसासों के संग।
समंदर आएगा, ले जाएगा कुछ दर्द और एहसास मेरे।
सुना है खारे पानी में बड़ी ताक़त है।
कहना समंदर से, मेरे घावों को भी धो दे –
अपने कोलाहल से, अपनी खारी लहरों से।

और मैं फिर से बैठूँगी,
समय की खुरदरी उस रेत में,
कि एहसासों के छिलने में,
मुझको मेरे होने का भी एहसास तो हो।
और मैं फिर से बैठूँगी,
खारी लहरों के इंतज़ार में,
कि नमक में भीग कर ही
ख़त्म मेरे वजूद की तलाश तो हो।