पच्चीस साल पहले
स्कूल में लिखते थे निबंध –
२०२० का भारत।
हमारे सपनों का वो स्वर्णिम,
चमचमाता भारत!
चाँद से आगे चढ़ता भारत!
विश्व में सबसे आगे बढ़ता भारत!
विकास की ओर अग्रसर,
हाथों में हाथ लिए, एक-जुट चलता भारत!
जहाँ बातें कहने, मत रखने की आज़ादी थी,
शाश्त्रार्थ-अहिंसा की रीति चलती आयी है जहाँ।

पर अब देखती हूँ,
साम्प्रदायिकता, अराजकता में उलझा भारत।
धर्म – जाती -भाषा में बंटा भारत।
हिंदुस्तान और इंडिया के बीच जूझता भारत।
अकेले मैंने ही नहीं देखा था वो सपना,
न अकेले मैंने ही लिखे थे वो निबंध।
वो सपने देखने वाले बच्चे
क्यों बंट गए हैं आज?
कहीं पंडित, कहीं क़ाज़ी,
कहीं भक्त-भजन, कहीं लिबटार्ड, कहीं नमाज़ी,
कहीं अर्बन नक्सल, कहीं अर्बन नाज़ी,
और कहीं हाशिये पर बैठ तमाशा देखते समाजी।

कुछ वोट के सौदागर आये,
और हमने कर लिया सौदा ?
अपने सपनों का, अंतरात्मा का, ज़मीर का?
क्या छोड़ कर जायेंगे हम
अगली पीढ़ी के लिए ?
मेरा मज़हब, मेरा देश, मेरी ज़मीन,
मेरा हिस्सा, मेरा बदला, मेरा स्वार्थ!
अपने लोभ, अपने लाभ के लिए
कब तक सौदा करते जायेंगे
अपने बच्चों के भविष्य का?
आगजनी, हिंसा, नफरत की धरोहर दे जायेंगे?
जले हुए देश की राख़ सौंप कर जायेंगे?

अपनी खुदगर्ज़ सोंच से
कुछ समय मिले तो,
पढ़ियेगा आज किसी बच्चे की निबन्ध।
पढ़ियेगा, उस बच्चे के सपनों को,
देखिएगा २०५० के भारत की उसकी तस्वीर को,
हमसे उसकी आशाओं को।
फिर कुछ ऐसा करियेगा
कि उन बच्चों की उम्मीदों पर
खरे उतर पायें।
उनके हाथ में क़लम, सर पर छत
पेट में रोटी, दिल में प्यार
और मन में आत्मविश्वास भर पायें।

बहुत आसान है पत्थर फेंकना।
बहुत आसान है अपशब्द कहना।
अब कुछ मुश्किल काम करना है –
हमें अब बदलाव की वाणी बोलनी है,
हमें अब उत्थान की वाणी बोलनी है ,
हमें अब साम्य की वाणी बोलनी है।