वो पुरुष

जिन्होंने मुझे पुरुषों से कमतर जाना,

भीड़ और अंधेरों की आड़ में

मुझ पर सीटियाँ बजायी, मुझे छेड़ा,

मेरे पीठ पीछे मुझ पर फ़ब्तियाँ कसी;

मैं उन मर्दों को नहीं जानती थी।

वो मर्द मेरे क़रीबी न थे।

 

पर मैं उन महिलाओं को

बहुत अच्छी तरह पहचानती हूँ,

जिन्होंने मेरे अरमानों को घूँघट में घोंट दिया।

जिन्होंने हर संभव मौके पर मुझे बताया

कि मैं एक औरत हूँ –

और औरतें हमेशा मर्दों से कमज़ोर होती हैं।

वो महिलायें मेरी माँ, बहन, मौसी, चाची लगती हैं,

जिन्होंने मुझे मेरे रहन-सहन, पहनावे पर

बार-बार बार मुझे टोका।

इतने तंग कपड़े क्यों पहने हैं?

क्या दुपट्टा नहीं है तुम्हारे पास?

चूड़ी-बिंदी-सिन्दूर क्यों नहीं लगाती?

उपनाम नहीं बदला? पति के नाम से शर्म आती है?

 

 

मेरी बहुत अपनी हैं वो महिलायें

जिन्होंने मुझे बताया कि

लड़कियों को तो समझौता करना ही पड़ता है।

अकेली नहीं रह सकती न लड़कियाँ –

हर वक़्त उन्हें एक सहारा, एक पहरेदार चाहिए।

मुझे समझाया कि

नौकरी करो, उसे जिंदगी न समझ बैठो;

क्योंकि अच्छे घर की बहु-बेटियाँ

अपने परिवार में ही अपनी खुशियाँ ढूंढ लेती हैं।

अपनी महत्वाकांक्षाओं, प्रतिभाओं, आशाओं को

समाज की दहलीज़ पर न्योछावर कर देना ही

उनकी नियति और निर्वाण है।

 

 

क्यों करती हैं ऐसा ये ?

क्यों खींचती रहती हैं लड़कियों को पीछे,

केकड़ों की तरह ?

पुरुषों ने नियम अपनी सुविधा से बनाये –

महिलाओं को अधीन रखने के लिए ।

और महिलाओं को ही रख छोड़ा

उन नियमों की रखवाली के लिए।

और महिलायें बड़ी निष्ठा से उगाही करती रही हैं

उन सारे बेतुके-बेमानी नियमों की।

 

 

क्यों न इन नियमों को बदल देती हैं महिलायें ?

क्यों न वही कुछ सवाल

अब लड़कों से भी पूछती हैं –

कहाँ जा रहे हो ? क्यों ? कब तक आओगे?

और कहती हैं लड़कियों से कि

सक्षम हो तुम, जो चाहे हासिल है तुम्हें।

जिन बंधनों से बंधी रही हूँ मैं,

उनमे नहीं बंधने दूंगी तुमको भी।

तुम उड़ो – तुम्हारे पंखों को हवा मैं दूँगी।

जो आयें मुसीबतें तो मत घबराना –

तुम्हारे साथ डट कर मैं खड़ी रहूँगी।

तुम बनाओ अपने सपनों की आज़ाद दुनियाँ नयी –

तुम्हारे साथ, थोड़ा खुल कर मैं भी जी लूँगी।